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परचेज़ ऑर्डर की नियम और शर्तें
आइटम सप्लायर को बताते हैं कि क्या भेजना है। शर्तें बताती हैं कि कैसे: कब, कहाँ, किस हालत में, और पेमेंट कब मिलेगा। छोटी, साफ़ शर्तें दोनों तरफ़ की हिफ़ाज़त करती हैं।
शर्तें क्यों ज़रूरी हैं
भारत में जिस परचेज़ ऑर्डर को सप्लायर मान लेता है, लिखकर या माल भेजकर, वह Indian Contract Act के तहत आप दोनों के बीच कॉन्ट्रैक्ट बन जाता है। झगड़ा हो तो दोनों PO की शर्तें ही दिखाते हैं। जो शर्तें लिखी नहीं हैं, उन्हें साबित करना मुश्किल है।
सैंपल शर्तें जिन्हें आप बदल सकते हैं
- दाम: "इस ऑर्डर के रेट पक्के हैं और पैकिंग शामिल है। GST अलग, जैसा दिखाया है।"
- डिलीवरी: "दिखाई गई तारीख तक, सुबह 10 से शाम 6 बजे के बीच, माल पहुँचाने वाले पते पर डिलीवर करें।"
- भाड़ा: "हमारे दरवाज़े तक भाड़ा सप्लायर देगा" (या "भाड़ा हम देंगे, हमारे ट्रांसपोर्टर से")।
- कागज़: "माल के साथ टैक्स इनवॉइस और डिलीवरी चालान भेजें। दोनों पर हमारा PO नंबर लिखें। ई-वे बिल की लिमिट से ज़्यादा के माल के साथ ई-वे बिल गाड़ी में होना चाहिए।"
- जाँच: "माल मिलने के 3 कामकाजी दिन में जाँचा जाएगा। कम, टूटा या गलत माल सप्लायर के खर्चे पर लौटाया जाएगा।"
- लेट डिलीवरी: "माल लेट हुआ तो हम लेट वाले हिस्से का ऑर्डर बिना किसी चार्ज के कैंसल कर सकते हैं।"
- पेमेंट: "माल और सही टैक्स इनवॉइस मिलने के 30 दिन में, बैंक ट्रांसफ़र से पेमेंट।"
- वापसी: "लौटाया या रिजेक्ट किया माल सप्लायर के क्रेडिट नोट से एडजस्ट होगा।"
- कैंसल करना: "जो हिस्सा अभी डिस्पैच नहीं हुआ, उसे हम लिखित सूचना देकर कैंसल कर सकते हैं।"
अपनी शर्तें मेकर में एक बार टाइप करें; अगली बार सेव किया परचेज़ ऑर्डर कॉपी करके सिर्फ़ आइटम बदलें।
छोटे सप्लायर को समय पर पेमेंट
अगर आपका सप्लायर माइक्रो या स्मॉल एंटरप्राइज़ (Udyam रजिस्ट्रेशन) के रूप में रजिस्टर्ड है, तो MSMED Act तय करता है कि आप पेमेंट में कितना समय ले सकते हैं: तय की गई अवधि, जो माल मंज़ूर करने के दिन से 45 दिन से ज़्यादा नहीं हो सकती, या कोई अवधि तय न हो तो 15 दिन। देर से पेमेंट पर RBI के बैंक रेट का तीन गुना ब्याज लगता है। इनकम टैक्स के नियम भी यह खर्चा तभी मानते हैं जब ऐसे सप्लायर को इन सीमाओं में पेमेंट हो, इसलिए देर से पेमेंट करने पर उस साल आपका टैक्स बढ़ सकता है।
आम गलतियाँ
- असली रेट या तारीख की जगह "जैसा बात हुई" लिख देना।
- भाड़े का ज़िक्र न करना, ताकि सप्लायर उसे इनवॉइस में जोड़ दे।
- जाँच की कोई अवधि न होना, ताकि हफ़्ते बाद मिली टूट-फूट पर बहस हो।
- माइक्रो या स्मॉल सप्लायर के लिए 45 दिन से लंबी पेमेंट शर्त।
आगे: PO, चालान और इनवॉइस आपस में कैसे जुड़ते हैं।